आई.ए.रिचर्ड्स का काव्य-भाषा सिद्धांत
आई.ए.रिचर्ड्स का काव्य-भाषा सिद्धांत
अ] काव्य के संप्रेषण का मुख्य माध्यम
भाषा ही है। रिचर्ड्स का भाषा संबंधी चिंतन महत्वपूर्ण है। उसने प्रयोग की दृष्टि से भाषा के दो वर्ग माने हैं -
1.तथ्यात्मक प्रयोग - इसका प्रयोग
वैज्ञानिक और दार्शनिक करते हैं।
2.रागात्मक प्रयोग - रचनाकार भाषा के रागात्मक वर्ग का प्रयोग करते हैं। रागात्मक
वर्ग की भाषा में प्रतीकों, बिंबों और भाव-संकेतों
को विशेष महत्त्व दिया जाता है। यही भाषा
कवियों और रचनाकारों की अनुभूति को
संप्रेषित करने में समर्थ होती है।
आ] शब्द और अर्थ के संबंधों पर गहराई से
विचार करते हुए रिचर्ड्स ने चार प्रकार के
अर्थों
का उल्लेख किया है-
1.वाच्यार्थ या अभिधार्थ
2.भाव
3.वक्ता की वाणीगत चेष्टा
4 अभिप्राय
इ] रिचर्ड्स के अनुसार समृद्ध और समर्थ रचनाकार की भाषा में उपर्युक्त सभी विशेषताएं होती हैं। भाषा से सामान्यतः उपर्युक्त चारों
प्रकार के अर्थ सूचित होते हैं, किंतु विषय और
परिस्थिति के भेद से इनका अनुपात बदलता रहता है।
जैसे विज्ञान की पुस्तकों में वाच्यार्थ का अधिक प्रयोग होता है।
ई] रिचर्ड्स के अनुसार सेन्स या वाच्यार्थ में
किसी वस्तु विशेष या किसी विधेय को शब्दों के
द्वारा सूचित किया जाता है। ( विज्ञान एवं गणित
आदि में प्रयोग)
विज्ञान की पुस्तकों में वाच्यार्थ तो
काव्य में भाव की अतिशयता होती है, फिर भी ये अर्थ परस्पर सर्वथा असंबद्ध नहीं हैं- वे एकदूसरे से जुड़े हुए हैं। काव्य में भाव या भावार्थ
की इतनी अधिक महत्ता होती है कि वहाँ
वाच्यार्थ या सूच्य तथ्य गौण हो जाते हैं।
उ] अर्थ और भाव के पारस्परिक संबंध को
स्पष्ट करते हुए रिचर्ड्स ने उसके तीन रूप
स्वीकार किए हैं-
1.जहाँ अर्थ ही भाव का बोधक हो।
2.जहाँ अर्थ भाव की अनुभूति का सूचक हो।
3.जहाँ प्रसंग विशेष के कारण अर्थ
विभिन्न भावों का सूचक हो।
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