अरस्तु


 भूमिका

 

अरस्तू (384 ईपू – 322 ईपू) यूनानी दार्शनिक थे।

अरस्तू (Aristotiles) का जन्म मकदूनिया के स्तगिरा नामक नगर में हुआ था। उनके पिता सिकंदर के पितामह के दरबार में चिकित्सक थे। उन्हें सिकंदर महान का गुरू होने का भी गौरव प्राप्त है। ज्ञान-विज्ञान के लगभग सभी क्षेत्रों पर उनका समान अधिकार था। अरस्तू ने भौतिकी, आध्यात्म, कविता, नाटक, संगीत, तर्कशास्त्र, राजनीति शास्त्र, नीतिशास्त्र, जीव विज्ञान सहित कई विषयों पर रचना की। अरस्तू ने अपने गुरु प्लेटो के कार्य को आगे बढ़ाया। उनकी कृतियों की संख्या 400 मानी गई है, किन्तु उनकी प्रतिष्ठा के लिए दो ही ग्रंथ उपलब्ध है- 'तेख़नेस रितेरिकेस' जो भाषण कला से सम्बन्धित है। इसका अनुवाद 'भाषण कला' (Rhetoric) किया गया, दूसरा 'पेरिपोइतिकेस' जो काव्यशास्त्र से सम्बन्धित है। जिसका अनुवाद 'काव्यशास्त्र' (poetics) किया गया हालांकि 'काव्यशास्त्र' का यह ग्रंथ वृहत् ग्रंथ न होकर एक छोटी-सी पुस्तिका मात्र है I
अरस्तू ने जिन काव्यशास्त्रीय सिध्दांतो का प्रतिपादन किया, उनमें से तीन सिध्दांत विशेष महत्व रखते हैं- १) अनुकरण सिध्दांत २) त्रासदी-विवेचन ३) विरेचन सिध्दांत।

अनुकरण-सिध्दान्त

1.  यूनानी के 'मिमेसिस' (Mimesis) का अंग्रेजी अनुवाद 'इमिटेशन' है  , और हिन्दी में अनुकरण है
2.   अरस्तू ने प्लेटो द्वारा प्रयुक्त 'mimesis' शब्द तो स्वीकार करते हुए उसे एक नवीन अर्थ देते है
3.  प्लेटो 'अनुकरण' शब्द का प्रयोग हू-ब-हू नकल को मानते है जबकि अरस्तू ने उसे निश्चित अर्थ दिया।
4.   अरस्तू ने कला को 'प्रकृति की अनुकृति' माना है। यहाँ अरस्तु के अनुसार अनुकरण 'बाह्यरूप की अनुकृति' नहीं है, जैसी कि प्लेटो की धारणा थी।
5.   वे कहते हैं कि अनुकरण प्रकृति के बाह्यरूपों का नहीं, उसकी सर्जन-प्रक्रिया का है। कलाकार बाह्यजगत् से सामग्री का चयन करते है और उसे अपने तरीके से तराशकर इस प्रकार पुन: प्रस्तुत करते है कि वह कलाकृति, कलात्मक अनुभूति को जन्म देती है।
6.   इस सम्बन्ध में एबरक्रोम्बे का मत उल्लेखनिय है। उन्होंने लिखा है कि अरस्तू का तर्क था कि यदि कविता प्रकृति का केवल दर्पण होती, तो वह हमें उससे कुछ अधिक नहीं दे सकती थी जो प्रकृति देती हैपर सत्य यह है कि हम कविता का आस्वादन इसलिए करते हैं कि वह हमें वह प्रदान करती है जो प्रकृति नहीं दे सकती।
7.   कवि की कल्पना में जो वस्तु-रूप प्रस्तुत होता है, उसी को वह भाषा में प्रस्तुत करता है। यह पुन:प्रस्तुतीकरण ही अनुकरण है।
8.   अरस्तू के अनुसार कलाकार तीन प्रकार की वस्तुओं में से किसी एक का अनुकरण कर सकता है-
१) प्रतीयमान रूप में, अर्थात् जो वस्तु जैसी है, वैसी ही दिखाई दे।
२) सम्भाव्य रूप में, अर्थात् जो वस्तु जैसी नहीं है, किंतु वैसी हो सकती है और
३) आदर्श रूप में, अर्थात् किसी वस्तु को ऐसा होना चाहिए।
9. इनमें पहली स्थिति हू-ब-हू नकल है। दूसरी एवं तीसरी स्थितियों में अनुकरण वास्तविक जगत् से भिन्नत है। इन स्थितियों में कविता के संदर्भ में कहा जाय तो, कवि बाह्य जगत् को आधार बनाते हुए, वह कल्पना तथा आदर्श की भावनाओं का सहारा लेकर उस वस्तु का चित्रण कुछ इस प्रकार करते हैं कि वह बाह्य, इन्द्रियगोचर या भौतिक जगत् की सीमा से ऊपर उठ जाती है।
10 अरस्तू का एक और विचार महत्वपूर्ण है। वह विचर इतिहास को लेकर है। इतिहास और काव्य की तुलना करते हुए अरस्तू ने काव्य के सत्य को इतिहास के तथ्य से ऊँचा मानते है।
11 अरस्तू का मत है कि 'कवि और इतिहासकार में वास्तविक भेद यह है कि –
१) इतिहास केवल घटित हो चुकी घटनाओं का उल्लेख करता है, जबकि काव्य में सम्भाव्य या घटित होनी वाली घटना तथा आदर्श स्थितियों का वर्णन होता है।
२) इतिहास केवल बाह्य जगत् की विशिष्ट घटनाओं का उल्लेख एवं विवेचन प्रस्तुत करता है, जबकि काव्य का सत्य घटना विशेष तक ही सीमित नहीं होता, बल्कि 'सामान्य' भी होता है।
३) इतिहास वस्तुपरक होता है। इसके विपरीत काव्य में अनुभूति, विचार दर्शन का सहारा लिया जाता है।
12 निर्ष्कष: अरस्तू अपनी 'अनुकरण' विषयक अवधारणा में इस बात पर बल देते हैं कि काव्य में केवल बाह्य जगत् में प्रत्यक्ष जीवन का ही अनुकरण नहीं किया जाता, बल्कि सूक्ष्म, आंतरिक और अमूर्त जीवन का भी अनुकरण किया जाता है। इसके लिए कवि या कलाकार अनुभूति एवं कल्पना का आश्रय लेते है।

विरेचन सिध्दांत

यूनानी शब्द कथार्सिस ('Catharsis') का हिन्दी रूपांतर 'विरेचन' होता है। जिस प्रकार कथार्सिस ('Catharsis') शब्द यूनानी चिकित्सा-पध्दति से सम्बध्द है, उसी प्रकार 'विरेचन' शब्द भारतीय आयुर्वेद-शास्त्र से सम्बन्धित है। भारतीय आयुर्वेद के अनुसार शरीर में वात, पित्त, कफ - ये तीन दोष (विकार) होते हैं। उचित औषधिओं के प्रयोग से शरीर के इन विकारों को बाहर निकाला जाता है। वैद्य के पुत्र होने के कारण अरस्तू ने यह शब्द वैद्य-शास्त्र से ग्रहण करके काव्यशास्त्र में उसका लाक्षणिक प्रयोग किया है। अरस्तू त्रासदी(Tragedy) को सर्वश्रेष्ठ मानते थे। उनके अनुसार "Tragedy is an imitation of an action that is serious, complete and of a certain magnitude...... through pity and fear effecting the proper purgation or Katharsis of these emotions."
अर्थात् त्रासदी किसी गम्भीर स्वतः पूर्ण तथा निश्चित आयाम से युक्त कार्य को अनुकृति का नाम है।... जिसके करुणा त्रास से उद्रेक द्वारा इन मनोविकारों का उचित विवेचन किया जाता है।
 अरस्तू के अनुसार त्रासदी दर्शकों के मन में करूणा एवं त्रास (दु:ख) की भावनाओं को उकसाकर उनका विरेचन कर देती है। यह एक प्रकार से मनोविकारों को उभारकर शांत करने और करूण एवं त्रास उत्पन्न करके व्यक्तियों को 'शुध्दि का अनुभव' प्रदान करने की प्रक्रिया है, जो अन्त में आनंद प्रदान करती है। इस सन्दर्भ में अरस्तू के परवर्ती व्याख्याकारों ने विरेचन के भिन्न-भिन्न अर्थ और व्याख्याएँ प्रस्तुत की हैं- १) धर्मपरक २) नीतिपरक ३) कलापरक।

1) धर्मपरक अर्थ

अरस्तू के व्याख्याकारों में प्रो॰ गिल्बर्ट मरे और लिवि ने विरेचन की धर्मपरक व्याख्या प्रस्तुत की है। इसका सम्बन्ध धार्मिक उत्सवों से है। प्रो॰ गिल्बर्ट मरे का कथन है कि - ‘‘यूनान में दिओन्यूसस नामक देवता से सम्बद्ध उत्सव अपने आप में एक प्रकार की शुद्धि का प्रतीक था, जिसमें विगत् समय के कलुष और पाप से मुक्ति मिल जाती है। इस प्रकार बाह्य विकारों द्वारा आन्तरिक विकारों की शान्ति का यह उपाय अरस्तू के समय में धार्मिक संस्थाओं में काफी प्रचलित था। उन्होंने इसका लाक्षणिक प्रयोग किया है

2) नीतिपरक अर्थ

बारनेज नामक जर्मन विद्वान ने विरेचन की नीतिपरक व्याख्या की है। उसके अनुसार मानव-मन अनेक मनोविकारों से आक्रान्त रहता है। जिनमें करुण और भय, मूलतः दुःखद के मनोवेग हैं। त्रासदी रंगमंच पर अवास्तविक परिस्थितियों द्वारा इन मनोवेगों का निराकरण और उसके परिणामस्वरूप मानसिक सामंजस्य की स्थापना करती है। वर्तमान मनोविज्ञान तथा मनोविश्लेषण शास्त्र भी इस अर्थ की पुष्टि करते हैं।
3) कलापरक अर्थ
गेटे और अंग्रेजी के स्वच्छन्दतावादी कवि आलोचकों में विरेचन के कलापरक अर्थ के संकेत मिलते हैं। अरस्तू के प्रसिद्ध व्याख्याकार प्रो॰ बूचर का मत है कि विरेचन केवल मनोविज्ञान अथवा निदानशास्त्र के एक तथ्य विशेष का वाचक न होकर, एक कला-सिद्धान्त का अभिव्यंजक भी है। इस प्रकार त्रासदी का कर्त्तव्य-कर्म केवल करुणा या त्रास के लिए अभिव्यक्ति का माध्यम प्रस्तुत करना ही नहीं है अपितु इन्हें एक सुनिश्चित कलात्मक परितोष प्रदान करना भी है। विरेचन का अर्थ यहाँ व्यापक है- मानसिक संतुलन इसका पूर्व भाग मात्र है, परिणति उसकी कलात्मक परितोष का परिष्कार ही है जिसके बिना त्रासदी के कलागत आस्वाद का वृत्त पूरा नहीं होता।
 विरेचन की यह प्रक्रिया भारतीय काव्य शास्त्र के अन्तर्गत साधारणीकरण की अवधारणा से मेल खाती है।

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